Friday, September 23, 2016

अपने देश में ' शहीद ' दूसरे देश में ' मार गिराया ' .. . .बस और कुछ नहीं।

     

             आज युद्ध ही एकमात्र हल रह गया है क्या ?.. और कोई रास्ता नही ! .. रास्ता तो सचमुच कोई भी नज़र नहीं आता , और  युद्ध भी समस्या का हल नही होते। ... हम चाहे कितना भी ज़ोर से चीख-चीख कर कह लें , लोगों को उकसाने की कोशिश कर लें  की बस , ..अब और नही , ..अब युद्ध ही होगा। ..पर यह समस्या का हल नहीं है , स्थाई हल तो बिलकुल भी नही।  मुझे तो समझ में भी नहीं आता की लोग  मरने-मारने पर क्यों आमादा हो जाते है !!!

         एक और युद्ध भले ही पिछले वर्षों में हुई तमाम घटनाओं का मुँहतोड़ जवाब हो  पर उसके बाद भी समस्या जस की तस ही रहने वाली है।  ..वे सभी लोग जो इस तरह की घटनाओं को उकसाने की असली वजह होते है , पूरी तरह से सुरक्षित ही रहते है।  .भुगतते हैं तो सिर्फ सैनिक और आम इंसान , जो हमेशा सिर्फ शांति , अमन -चैन ही चाहते हैं।

           पिछले दिनों हुई घटनाओं का जवाब तो अवश्य दिया जाना चाहिए , पर किसी और तरीके से। और इंसानों को  मौत के इस भयावह खेल में झोंक देना मुझे ठीक नही लगता।  .. हालांकि  यहां जोशीले लोगों की कमी नहीं , .ऐसी बड़ी-बड़ी बातें , वह  भी आर-पार  की  करने लग जाते हैं।  ..इन में से बहुतों का देश प्रेम सिर्फ बातें बनाने तक ही सीमित है।  .. आज ऐसा कोई नियम-क़ानून बन जाए की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सभी योद्धाओं ( बातों के ) को हफ्ते-दस दिन की ट्रेनिंग के बाद सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए महीने में दस दिन के लिए भी भेज दिया जाये तो बहुत से लोग चुप्पी साध  जायेंगे।

            आज की ज़रूरत यही है की हर व्यक्ति को कुछ समय के लिए सेना में भर्ती होना ही पड़े।   इसके लिए कोई क़ानून भी बने। ... क्यों कुछ लोग सारी  ज़िन्दगी संघर्ष करें !  क्षण-क्षण पर देशप्रेम साबित करें ! .. वह  भी उनके लिए जो देश के भीतर लोगों का जीना दुश्वार किये हुए हैं।  ...किसी भी युद्ध के परिणाम जो भी हों ,  देश की व्यवस्थाएं  चरमराती ही है। ... मरता इंसान ही है। . ....... चाहे इस पर का हो या उस पर का। ..... फ़र्क़ सिर्फ इतना है की वह  अपने देश में ' शहीद ' कहलाता है तो दूसरे देश में ' मार गिराया ' .. . .बस और कुछ नहीं। 

Thursday, September 15, 2016

. पितृपक्ष

आज से पितृ पक्ष प्रारम्भ हो रहा है , हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के लिये यह पक्ष बहुत महत्वपूर्ण है .कहा जाता है कि इन दिनों "पित्रलोक" पूरे वर्ष भर में धरती के सबसे निकट होता है . लोग अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार पितरों को जल चढाते ,पन्डितों-गरीबों को भोजन कराते,दान वगैरह देते हैं . .
यह सच है ,हममे से कोई भी यह नहीं जानता कि मृत्यु के बाद क्या !! कुछ होता भी है या नहीं. अगर में अपने बारे में कहूं तो मुझे ईश्वर के अस्तित्व में पूरा-पूरा विश्वास है,मै किसी धर्म विशेष में आस्था नही रखती,मेरे लिये सभी धर्म एक समान हैं .पूजा-पाठ मै नही करती ....हां,सुबह सबह उस अदृश्य ईश्वर से कभी बैठे बैठे और कभी लेटे ही कभी कुछ कहती ,कुछ मांगती ,कभी शुक्रिया अदा करती और कभी कभी खरी-खोटी सुनाती हूं .सच मानिये ,जब भी मैने ईश्वर से कुछ मांगा है ,मिला है .ईश्वर तो हर वक्त हमारे साथ रहता है ..हमारी ताकत बनकर.
अक्सर लोगों के मुंह से यह सुनने में आता है. कि, फ़लां दिन गंगा में डुबकी लगाने से ,फ़लां देवता की पूजा करने से हमारे सारे पाप धुल जाते हैं .हंसी आती है ऐसी बातें सुनकर .ईश्वर कोई सरकारी ऑफिस का बाबू नहीं जो चढावा लेकर पाप को पुण्य में तब्दील कर देगा..
मै पित्रपक्ष पर कुछ लिखना चाह रही थी ..मृत्यु के बाद क्या ?? इसमें उलझे बगैर यदि हम अपने पूर्वजों की याद में वर्ष में १५ दिन सिर्फ़ १० मिनट निकाल कर उनको जल अर्पित करें .,उनका स्मरण करें.,तो कोई हर्ज नही . ऐसा करने से हमें एक अनूठा सुख ,संतोष प्राप्त. होगा ,जिनसे हम अलग हो चुके है.उनके हमारे आस-पास होने ,हमारे साथ होने का अहसास होगा..हम चाहें तो कभी भी ऐसा कर सकते हैं .पर हममें से किसी के पास इतनी फ़ुर्सत नहीं .इसलिये ,हिन्दु पचांग के अनुसार चुने हुए इन १५ दिनों में अपने पितरों ,पूर्वजों के लिये थोडा समय अवश्य निकालें ।... 

Wednesday, September 14, 2016

कोशिशें जारी रहनी चाहिए -

हमारे देश में बहुत सी भाषाएँ बोली और लिखी जाती है।  ..शिक्षा का माध्यम हिंदी , अंग्रेजी के साथ ये प्रान्त विशेष में बोली जाने वाली भाषाएँ  भी है।
         भाषा लिखित हो या मौखिक , .. हमारी अभिव्यक्ति  का  ही माध्यम है।  कोई भी भाषा अच्छी या बुरी नही होती। .हाँ , व्याकरण की दृष्टि से कुछ भाषाएँ समृद्ध ज़रूर है। हमारे मन में  सभी भाषाओँ के लिए आदर की भावना होनी चाहिए। 
      कुछ साल पहले तक जब अंग्रेजी माध्यम के सरकारी -गैरसरकारी विद्यालयों का बोलबाला नही था , तब बच्चे हिंदी भाषा के माध्यम से ही शिक्षा ग्रहण किया करते थे , अंग्रेजी सिर्फ एक विषय के रूप में होती थी ,  तब बच्चे हिंदी लिखने-पढने में सहज हुआ करते थे ,  और अंग्रेजी को रट -रट  कर  परीक्षा पास किया करते थे। हालाँकि , कुछ बच्चे तब भी कुशाग्र बुद्धि के हुआ करते थे और हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह लिखते-बोलते थे।  पर यहां में  एक औसत बुध्दि के छात्र की ही बात करुँगी। ...हाँ , तो जो हालात तब थे वो आज भी है , कुछ बच्चे आज भी अंग्रेजी और हिंदी, दोनों में बराबर योग्यता रखते है। 
         आज जब हम अपने बच्चों को दो -ढाई साल की उम्र से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देना शुरू करते है , रोज़मर्रा के उपयोग की चीज़ों के नाम भी अंग्रेजी में बताना शुरू कर देते है , ..तब स्वाभाविक रूप से बच्चा शिक्षा के विषय विशेष में कितना भी  कमज़ोर हो पर शिक्षा के माध्यम की जो भाषा है , उस में अवश्य पारंगत हो जाता है।  ..अंग्रेजी माध्यम से सभी विषयों की पढ़ाई होने के कारण पहले जहां अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढाई जाती थी , वही हाल आज हिंदी का है।
          हो सकता है मेरा सोचना -समझना गलत हो ,  पर आज जहां बच्चे के विद्यालय में प्रवेश से लेकर शिक्षा पूरी होने तक जो कठिन प्रतियोगिता है , प्रत्येक विषय में बच्चे पर  शत -प्रतिशत अंक लाने के दबाव के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी सक्रीय रहने का बोझ इतना ज्यादा है की आठ-नौ  घंटे ( विद्यालय आने-जाने का समय मिलकर ) में बिताने के बाद , साथ ही विभिन्न प्रतियोगिताओं  की तैयारी करने के साथ बच्चा विज्ञान , गडित , आदि की तैयारी  में ही बाकि का समय निकाल देता है।  हिंदी और अंग्रेजी भाषा को पढने के लिए उसके पास बहुत कम समय होता है।
          आज बहुत से ऐसे देश भी है जो सिर्फ अपनी राष्ट्रिय भाषा के बलबूते  तरक्की कर रहे है।  हम भी कर सकते है , पर आज हमारे पास अपनी भाषा -हिंदी में तमाम  विषयों पर किताबें तक उपलब्ध नहीं है , जिन्हें बच्चे पढ़कर विज्ञान , तकनीक या व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर सकें।  इन सभी विषयों की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से करना विवशता ही है।  ऐसे में जब दिन के चौबीसों घंटे लोग अंग्रेजी भाषा के संपर्क में रहेंगे तो हिंदी से दूरी  बनना अचरज की बात नहीं।
           पिछले महीने की एक घटना का ज़िक्र यहां करती हूँ। मेरा बेटा  जो पंद्रह वर्ष का है , राज्य स्तरीय हिंदी और अंग्रेजी वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने गया , उसने दोनों ही बहसों में पदक भी जीते , ..चूँकि  इन प्रतियोगिताओं में विषय उसी समय दिया जाता है और बच्चों को दस-पंद्रह मिनिट का समय दिया जाता है की वह  किसी भी चीज़ की मदद लिए  बिना खुद सोच कर कुछ पॉइंट तैयार कर लें।  बच्चे भी एक पर्ची पर खास बातें लिख कर रख लेते है और मंच पर जाने से पहले  एक बार पढ़ लेते है।  मेरा बेटा  जब अंग्रेजी प्रतियोगिता में पदक लाया तो ख़ुशी तो होनी  ही थी , ...दो ही दिन बाद जब हिंदी वाद-विवाद में भी पदक ले आया तो हमें आश्चर्य भी हुआ , क्योंकि इसमें भी उसे भाग लेना है,  दो दिन पहले ही मालूम हुआ था। उसने कोई तैयारी भी नही की थी। हाँ , बचपन से ही वह  शुद्ध हिंदी बोलता और किसी के गलत बोलने पर टोकता भी था। ...  जब हिंदी विषय की तैयारी के लिए उसके द्वारा लिखे गए पॉइंट्स देखे तो सब का उच्चारण तो हिंदी  में ही था लेकिन लिखावट अंग्रेजी लिपि की थी। .. पूछने पर बताया की ऐसी प्रतियोगिताओं में तैयारी के लिए समय नही होता  ..हिंदी लिपि को पढ़ना आसान नहीं  होता , इसलिए हिंदी की बातों को अंग्रेजी में लिख लेते है।
        इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं , बातें हमें सोचने पर मज़बूर करती है की क्यों आज हिंदी हर जगह से गायब हो रही है।  ..दोषी आज की पीढ़ी नही बल्कि हम-आप ही है , जिन्होंने अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार में कोई कसर न छोड़ी।  .. आधुनिकता और सभ्यता का पैमाना अंग्रेजी भाषा को मान लिया।
            सिर्फ ' हिंदी-हिंदी ' कहने से कुछ न होगा , हिंदी भाषा में तमाम सुविधाएँ भी उपलब्ध करानी  होंगीं। कुछ लोग सच में हिंदी को आगे लाने के लिए  अथक प्रयास भी  कर रहे है। , .लम्बा समय लगेगा , पर उम्मीद है , सफलता मिलेगी।  और यह सफलता तभी संभव है जब हम -आप घरेलु स्तर से लेकर राज-काज के कार्य , सभी में इसका प्रयोग करें। ..हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।







            

Saturday, September 10, 2016

..वो आज भी लाचार हैं ...

बात दो-तीन दिन पहले की है , हमारे एक परिचित जिनकी उम्र तीस बत्तीस साल के आसपास होगी , आये हुए थे। कुछ दिन पहले ही इन सज्जन की शादी तय हुई है सो साथ ही यह अपने होने वाले ससुर जी को लाये थे। हम सब से मिलवाने , जो देखने से सीधे-सादे लग रहे थे। वैसे भी हमारे यहां लड़की का पिता जब अपनी बेटी की शादी के सिलसिले में लड़के वालों के यहां जाता है तो अपना पद , अपनी हैसियत अपनी कठोरता सब भूल कर लड़के वालों के सामने झुक सा जाता है।
....हाँ , तो उनलोगों को खाना खिलाने के बाद मैं किसी काम से किचेन की और आई , मैंने देखा की जो सज्जन (?) हमारे यहां आये हुए थे वो हाथ से इशारा करके थोड़ी रूखी आवाज़ में कह रहे थे -'' लाओ , इधर लाओ , इधर रखो , यहां सिंक में , लेआओ। '' ... मैंने भी खिड़की की और पलट कर देखा , की आखिर ये किससे इतनी बे-रूखी से बोल रहे है। .. देखा , इन सज्जन के होने वाले ससुर जी अपनी और अपने दामादजी (जो अभी तक हुए नही थे ) की जूठी थालियां , ग्लास लेकर सिंक की ओर चले आ रहे है। ..
आश्चर्य तो बिलकुल भी नही हुआ , ऐसा कई बार देखा-सुना है। यह इस क्षेत्र में ज्यादा है या और कहीं भी , नहीं कह सकती। हाँ इतना ज़रूर है की शादी-ब्याह तय करने में आज भी लड़की वालों की हालात बहुत दयनीय हो जाती है , भले ही लड़की उच्च शिक्षित , कमाने वाली , सभ्य परिवार से हो। बहुत से घरों में लड़के वाले आज भी अपने आप को भगवान् से कम नहीं मानते। बात-बात पर लड़की , उसके घरवालों को ज़लील करना ही अपना बड़प्पन समझते है। ..
हाँ , यह तय है की इस तरह की सोच वाले इस खुड -पेंच के चलते ज़िन्दगी भर न जाने किस झूठ के सहारे जीते है , दुसरो की ज़िन्दगी के साथ ये अपनी ज़िंदगी भी बर्बाद करते है। ये भूल जाते है की इनकी अपनी भी बेटियां हैं। भविष्य में इनके साथ भी यह हो सकता है।
हालाँकि ये सामाजिक बुराई कोई नई नहीं। बस , दो दिन पहले की घटना से अजीब सा लगा। ..पर आज भी जो सभ्य , सच्चे अर्थों में शिक्षित लोग है वो इसके विपरीत है। ..और ऐसे ही लोग ज़िन्दगी को खुद भी जीते है और दूसरों को भी जीने देते है। क्योंकि शादी-ब्याह के समय जो लोग सिर्फ लड़के वाले होने के कारण लड़की , लड़की वालों का अपमान करने में कोई कसर नही छोड़ते , ज़िन्दगी में खुद भी कभी सम्मान नही पा सकते। .....ईश्वर करे ,इनके यहां कभी शादी-ब्याह न हों। रहें अपनी अकड़ के साथ।

Sunday, September 4, 2016

ये निर्जला उपवास !

ये निर्जला उपवास !  अब क्या कहें ,  छुटपन से ही हम मम्मी को ढेर सारे तीज त्यौहार और एक से बढ़कर एक कठिन व्रत उपवास करते हुए देखते चले आ रहे है।  आज 'तीज ' है , हमने यही देख -सुन-पढ़ रखा था की तीज के दिन महिलाएं 'निर्जला व्रत ' करती है , रात  को पूजन करके अगले दिन सुबह अपना व्रत तोड़तीं है और पानी पीतीं है। यह सबका अपना व्यक्तिगत निर्णय है की कौन कैसे और कितने व्रत या उपवास  करे ,मेरा इससे कुछ भी लेना देना नहीं। यदि मैं अपनी बात करूँ तो मुझे लगता है की जिन लोगों का स्वास्थ्य उन्हें   इतने  कठिन व्रत करने की इजाजत नही देता  ,  उन्हें ऐसे व्रत जिनमें जल तक नही पिया जाता, नही करना चाहिए। और ऐसे ही व्रत 'निर्जला व्रत ' कहलाते है।
      हाँ  ! …तो …इस' निर्जला व्रत'  की एक नई परिभाषा ,जो आजकल बहुत से लोगों के मुंह  से सुन रही हूँ , बताती हूँ।  मेरी बहुत सी परिचित महिलाएं और दोस्तानियों का कहना -करना और मानना है  की 'वह व्रत या उपवास जिसमें हम फल-सब्जी , या कोई भी फलाहारी सामान खाते   है , दूध ,चाय , सूप ,फलों का रस  या कोई अन्य पेय पदार्थ पीते है --बस पानी नही पीते ,' निर्जला उपवास ' कहा  जाता है।' अयं ! !!  यह कैसी नई परिभाषा !  अरे खूब फलाहार करो ,खाओ-पियो , साथ में पानी भी पियो। किसने कहा  है  की जबरदस्ती भूखे रहो !  पर यहां तो अपनी सुविधानुसार मतलब ही बदल दिया है लोगों ने।    वैसे 'तीज' की ढेर सी शुभकामनायें। यही कुछ ऐसे त्यौहार हैं जो बार-बार हमें बचपन के दिनों की और ले जाते है........

Saturday, August 20, 2016

...फिर देखिये कमाल !

 
   आज ओलम्पिक में पदक लाने के लिए बेटियों की खूब वाह-वाही  हो रही है ,  होनी भी चाहिए , क्योंकि यह बहुत बड़ी उपलब्धि है , गर्व की बात है,  खिलाड़ी के लिए , खेल के लिए , देश के लिए , हम सब के लिए।  पर जिस तरह से सोशल साइट्स , व्हाट्स एप्प पर बेटियों के गुणगान  किये जा रहे है और बेटों को लानत-मलामत भेजी जा रही है  वह हास्यास्पद है।
      अचानक लोगों की सोच कैसे बदल गई !  आश्चर्य !!
 सच तो ये है की  हम में से ज्यादातर लोगों  की सोच कभी बदलती ही नही , हम  बदलना ही नही चाहते  , हमने कुछ घिसे-पिटे मापदंड तैयार कर लिए है , बस , उन्ही को ढोये जा रहे हैं। हमारे पहले की पीढ़ी में भी बहुत से लोग  खुले दिमाग के , स्वस्थ मानसिकता के थे  , बेटे -बेटी -बहु में भेद नही करते थे। ऐसे लोग  हमारी पीढ़ी में भी  है और आगे भी रहेंगे। जब मैं बहुत  छोटी थी तब लोगों को बात करते हुए सुनती  थी -'' ये सब समस्याएं , बातें अभी की है , अगले बीस-तीस साल बाद देखना , कोई टेंशन नही रहेगा , सब लोग अपनी मर्जी से जियेंगे। ये बे-सिर  पैर  की ड्रामेबाजी  सब ख़त्म हो जाएगी। ''  और मै मन ही मन सोचती की हे भगवान् ! जल्दी से बीस साल निकाल दो।
          आज के हालात देख कर लगता है की कुछ नही बदला।  अच्छे और बुरे लोग हमेशा से हैं , और रहेंगे।  औरों को क्या कहें ! हम खुद में कितना बदले है ? हमारी सोच कितनी परिपक्व हुई है ? .....  जो भेदभाव पहले थे , आज भी है।  बस , कुछ लोग अच्छे होने का ढिढोरा ज़रूर पीटने लगे है।
                वही लोग जो ' बेटी ' के समर्थन में बढ़-चढ़ कर बोल रहे है , अपने घर की बेटियों के लिए विपरीत सोच , रवैया  रखते  हैं।  दूसरे घर की बेटी के संघर्ष की लंबी-लंबी गाथाएं सुनाएंगे , की कैसे वो सबके खिलाफ होकर अपनी पसंद के रास्ते पर बढ़ी , सफलता पाई , और अपनी बेटी को कुछ करने देना तो दूर सोचने भी नहीं देना चाहते।
      सच तो ये है की बेटा  हो या बेटी , इनके बीच  किसी तरह का भेदभाव किये बगैर सबको समान अवसर देने चाहिए।  प्रतिभाओं की कमी नहीं है।   घर-घर में बसतीं हैं।  बस , ज़रूरत है तो उन्हें तराशने की , और   शुरुआत हमें स्वयं से ही करनी होगी।
...फिर देखिये कमाल !

Sunday, June 26, 2016

बारहवीं कक्षा के परीणाम आते ही बच्चों और माँ -बाप की कोशिश शुरू हो जाती है .एक अच्छे शिक्षण संस्थान में बच्चे के प्रवेश के लिये . ..कुछ भाग्यशाली और प्रतिभाशाली बच्चे नामी -गिरामी संस्थानों में दाखिला पा भी लेते है ....पर वो बच्चे जो बुद्धिमान हैं , प्रतिभाशाली भी है , ज़िन्होने अपनी बारहवीं तक की शिक्षा हिन्दी माध्यम से प्राप्त की है ..क्या इन हाई -फाई ..अंग्रेजी माहौल वाले . ..अंग्रेजी बोलने वाले शिक्षक और सहपाठियों के बीच सहज हो पाते होंगे !! सभी तो नहीं ..लेकिन कुछ बच्चों के लिये ऐसे माहौल में खुद को ढ़ालना बहुत मुशकिल होता होगा .. ...अवसाद का एक बडा कारण बनता होगा ... .हम माता - पिता को अपने बच्चे की क्षमताओं को अच्छे से समझना - परखना होगा ...बडी प्रतियोगिता .पास करा कर या अच्छे संसथान में प्रवेश दिला कर ही हमारी . ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती ..बच्चा ज़िस माहौल में रह रहा है , उससे समानंजस्य भी बिठा पा रहा है या नहीं ! यह भी जान ना हमारी ज़िम्मेवारी होगी ....