Saturday, August 20, 2016

...फिर देखिये कमाल !

 
   आज ओलम्पिक में पदक लाने के लिए बेटियों की खूब वाह-वाही  हो रही है ,  होनी भी चाहिए , क्योंकि यह बहुत बड़ी उपलब्धि है , गर्व की बात है,  खिलाड़ी के लिए , खेल के लिए , देश के लिए , हम सब के लिए।  पर जिस तरह से सोशल साइट्स , व्हाट्स एप्प पर बेटियों के गुणगान  किये जा रहे है और बेटों को लानत-मलामत भेजी जा रही है  वह हास्यास्पद है।
      अचानक लोगों की सोच कैसे बदल गई !  आश्चर्य !!
 सच तो ये है की  हम में से ज्यादातर लोगों  की सोच कभी बदलती ही नही , हम  बदलना ही नही चाहते  , हमने कुछ घिसे-पिटे मापदंड तैयार कर लिए है , बस , उन्ही को ढोये जा रहे हैं। हमारे पहले की पीढ़ी में भी बहुत से लोग  खुले दिमाग के , स्वस्थ मानसिकता के थे  , बेटे -बेटी -बहु में भेद नही करते थे। ऐसे लोग  हमारी पीढ़ी में भी  है और आगे भी रहेंगे। जब मैं बहुत  छोटी थी तब लोगों को बात करते हुए सुनती  थी -'' ये सब समस्याएं , बातें अभी की है , अगले बीस-तीस साल बाद देखना , कोई टेंशन नही रहेगा , सब लोग अपनी मर्जी से जियेंगे। ये बे-सिर  पैर  की ड्रामेबाजी  सब ख़त्म हो जाएगी। ''  और मै मन ही मन सोचती की हे भगवान् ! जल्दी से बीस साल निकाल दो।
          आज के हालात देख कर लगता है की कुछ नही बदला।  अच्छे और बुरे लोग हमेशा से हैं , और रहेंगे।  औरों को क्या कहें ! हम खुद में कितना बदले है ? हमारी सोच कितनी परिपक्व हुई है ? .....  जो भेदभाव पहले थे , आज भी है।  बस , कुछ लोग अच्छे होने का ढिढोरा ज़रूर पीटने लगे है।
                वही लोग जो ' बेटी ' के समर्थन में बढ़-चढ़ कर बोल रहे है , अपने घर की बेटियों के लिए विपरीत सोच , रवैया  रखते  हैं।  दूसरे घर की बेटी के संघर्ष की लंबी-लंबी गाथाएं सुनाएंगे , की कैसे वो सबके खिलाफ होकर अपनी पसंद के रास्ते पर बढ़ी , सफलता पाई , और अपनी बेटी को कुछ करने देना तो दूर सोचने भी नहीं देना चाहते।
      सच तो ये है की बेटा  हो या बेटी , इनके बीच  किसी तरह का भेदभाव किये बगैर सबको समान अवसर देने चाहिए।  प्रतिभाओं की कमी नहीं है।   घर-घर में बसतीं हैं।  बस , ज़रूरत है तो उन्हें तराशने की , और   शुरुआत हमें स्वयं से ही करनी होगी।
...फिर देखिये कमाल !

Sunday, June 26, 2016

बारहवीं कक्षा के परीणाम आते ही बच्चों और माँ -बाप की कोशिश शुरू हो जाती है .एक अच्छे शिक्षण संस्थान में बच्चे के प्रवेश के लिये . ..कुछ भाग्यशाली और प्रतिभाशाली बच्चे नामी -गिरामी संस्थानों में दाखिला पा भी लेते है ....पर वो बच्चे जो बुद्धिमान हैं , प्रतिभाशाली भी है , ज़िन्होने अपनी बारहवीं तक की शिक्षा हिन्दी माध्यम से प्राप्त की है ..क्या इन हाई -फाई ..अंग्रेजी माहौल वाले . ..अंग्रेजी बोलने वाले शिक्षक और सहपाठियों के बीच सहज हो पाते होंगे !! सभी तो नहीं ..लेकिन कुछ बच्चों के लिये ऐसे माहौल में खुद को ढ़ालना बहुत मुशकिल होता होगा .. ...अवसाद का एक बडा कारण बनता होगा ... .हम माता - पिता को अपने बच्चे की क्षमताओं को अच्छे से समझना - परखना होगा ...बडी प्रतियोगिता .पास करा कर या अच्छे संसथान में प्रवेश दिला कर ही हमारी . ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती ..बच्चा ज़िस माहौल में रह रहा है , उससे समानंजस्य भी बिठा पा रहा है या नहीं ! यह भी जान ना हमारी ज़िम्मेवारी होगी ....

Saturday, June 11, 2016

One Minute Film Competition- Entry 20- Yash Tiwari- DROP DEAD 2

 आज ' ड्रॉप डेड फाउंडेशन ' ने 'दैनिक भास्कर ' के सहयोग से ' One Drop Cinemas, ONE MINUTE FILM COMPETITION '.. में भेजी गई कुछ विडिओ को अपने यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड किया है ..इसमें यश की दो फिल्मों  को भी शामिल किया गया है ..चाहती हूँ ..इन सभी फिल्मों को जो किसी खास उद्देश्य से बनाई गई हैं , आप सब ज़रूर देखें -

Saturday, May 7, 2016

माँ ,तुम थकती नही ...!

मां ,कहां से शुरू करूं ..कुछ समझ में नहीं आ रहा ..तुम्हारे बारे में कुछ लिखना बहुत मुश्किल है ..तुम क्या हो ..सिर्फ़ वही लोग जान सकते है ..जो तुमसे किसी न किसी रूप मै जुडे हुए है ..तुम जैसा दूसरा कोई है ही नहीं .जब तुम्हारे बारे में सोचती हूं ,तो समझ ही नहीं पाती हूं .कैसे तुमने हम सब को इतने लाड-प्यार से पाला..तुम आठ-आठ घंटे स्कूल संभालती..घर संभालती. और हमारे यहां के मेहमान,रोज़ के  जुलने वाले .कितने लोग आते थे ..तुम सब का कितना खयाल करतीं ,आवभगत करतीं .जो अभी भी कर रही हो ..और हम सब की देखभाल के बारे में क्या कहूं सबकुछ कितने प्यार और अनुशासित तरीके से किया है तुमने ..हमने कभी तुम्हें किसी पर खीझते,डांटते-फ़टकारते नहीं देखा .बडे से बडी समस्या मुस्कुराते हुए तुमने हल की है ...
         तुम्हारी अपनी परेशानी क्या है .चाहे वो शारीरिक ,मानसिक या आर्थिक ..कैसी भी हो तुमने कभी हम पर जाहिर नहीं होने दी ...हमने कभी तुम्हे थका हुआ ,निराश या परेशान नहीं देखा ..बचपन से लेकर आज तक ,जब भी मै किसी तकलीफ़ में होती हूं बस ..तुम्हें बता देती हूं .जानती हो तुम्हें बताते ही मेरी हर तकलीफ़ गायब हो जाती है ...तुम हमारे लिये किसी जादुई परी से कम नहीं, .ईश्वरसे बढकर भी कह सकती हूं ..उससे तो प्रार्थना भी करनी पडती है ...
          जानती हो मां,तुम बहुत ज्यादा खूबसूरत हो ..मै यह सब इसलिये नहीं लिख रही .क्योंकि मै तुम्हारी बेटी हूं.,नहीं ..तुम सच में दुनिया की सबसे खूबसूरत मां हो ..जब हम छोटे थे..,तुम स्कूल से घर वापस लौटतीं थीं ..हम दूर से तुम्हें आते हुए देखते थे ..लंबा कद ,चमकदार गोरा रंग..,लंबे बाल.,बडी लाल बिंदी..सलीके से.पहनी हुई साडी..और गर्वीली चाल..तुम्हें देखकर हमें अपनेआप पर गर्व होने लगता था.
          हमने कभी भी तुम्हें एक पल के लिये .किसी पर आश्रित होते नहीं देखा..गजब का आत्मविश्वास और साहस है तुममें ..तुम्हारे जैसे स्वभाव का कोई भी व्यक्ती मज़बूरीवश ,पलभर के लिये भी..किसी की मदद लेता है ..,तो हम सब समझते हैं ..ऐसा करने में उसे कितनी तकलीफ़ होती है ...और यह सब देखने में हमें भी बहुत तकलीफ़ होती है ..
        मां ,तुम हमेशा जैसी हो वैसी ही रहना ..भले ही मदर्स डे आज हो ..पर हम सब रोज़ ही तुम्हारे लिये प्रार्थना करते हैं ...हैप्पी मदर्स डे ..मम्मा.......

Sunday, March 27, 2016

Tut Ankh Amun Official FULL MOVIE Censor Copy (By Yash Tiwari)

  आज से लगभग साल भर पहले मेरे बेटे यश ने सत्ताइस मिनिट की एक शार्ट मूवी  ' TUTANKHAMUN,'  बनाई थी , किसी की मदद लिए बगैर  . .इसका टीज़र और ट्रेलर मैं पहले ही यहां दिखा चुकी हूँ , इसमें कुछ कमियां भी नज़र आएंगीं , आवाज़ शुरुआत के कुछ दृश्यों में अस्पष्ट और धीमी  है , जो बाद में ठीक हो जाएगी।  मैं चाहती हूँ की तेरह वर्ष की उम्र के बच्चे की इस कोशिश को आप ज़रूर देखें। 







                   ........... . . How Kira's birthday turned out be a sequence of mysterious happenings from the verboten place to the exploration of evil spirit in search ofTUT-ANKH-AMUN's story...How she and her friends faced the cursing evil...their bravely ... their determination...their will power ... 
Will They succeed?...Will they be alive ? .https://youtu.be/uZGYUUPGFoM

Sunday, March 20, 2016

होली का हुडदंग....

लीजिये ,फ़िर होली का त्योहार आ गया ...बच्चे बोले ..चलो हम बाज़ार हो आते है .पांच दिन बाद ही तो होली है अभी तो खाने-पीने का सामान ,रंग,पिचकारी कुछ भी नही लिया..मैने भी खीझ कर कह दिया..अभी तो पांच दिन बाकी है न  !.सब हो जायेगा..दिमाग मत खाओ..कहने को तो मैने कह दिया .पर मै बच्चों के मन की बेचैनी को अच्छे से समझती थी .पांच दिन तो क्या ..हम तो पच्चीस दिन पहले से ही होली की तैयारी करने लगते थे ..अपने बचपन की होली और आज की होली मै बडा फ़र्क है .तब की होली ..और वो भी हमारे यहां की होली..हे भगवान !!!

होली की लगभग सभी तैयारियां होली दहन के समय तक पूरी हो जाया करती थीं जो थोडी बहुत गुझियां बननी शेष रह जाती थी वो होली दहन की देर रात तक बनाई जाती थी .इसके दो फ़ायदे हुआ करते थे ,एक-चूंकी अगले दिन छुट्टी होती थी और होली  मिलने वालों का भी आना -जाना शुरू हो जाता था.सो गुझियां बनाने का काम पूरा परीवार मिल बैठ कर निबटा लेता था ,
दो --रात भर घर की निगरानी भी हो जाती थी हंडियांऒ से..{अब आप सोचेगे की ये हंडियां क्या बला है तो सुनिये -हंडिया..एक मिट्टी का छोटा सा घडा होता था जिसमे तमाम तरह की गंदगी जैसे कीचड ,कचरा वगैरह भरकर उसे सुन्दर सा पैक कर दिया जाता था ,यह सारा काम शहर के स्कूल-कोलेज के लडकों द्वारा जमादारों की मदद से किया जाता था] इन पैक्ड हंडियाओ को होली दहन के बाद देर रात से सुबह चार -पांच बजे तक कुछ खास घरों के मुख्य दरवाजे पर जोर से पटक दिया जाता था.. .खास घर वे हुआ करते थे .जिनसे होली रखने वालो की टीम को मनचाहा चंदा न मिला हो ,जिस घर से छोटी-मोटी दुश्मनी हो ,.. जिस घर मै नापसंद टीचर हो..या फ़िर जिस घर में मनपसंद लडकियां हों .इन चार  विशेषताओ वाले घर को ही हंडियां का निशाना बनाया जाता था .सारी -सारी रात लोग जाग कर अपने -अपने घर की निगरानी किया करते थे.निगरानी भी छुप कर की जाती थी .वह भी सिर्फ़ यह जानने के लिये की हंडिया फ़ेकने वाला कौन है ..बडा ऊधम मचता था उस रात ..जैसा न कहीं देखा ना सुना ...
रात बारह बजे से सूरज उगने तक रह -रह के धडाम -भडाम की आवाजें हम सब सुनते रहते थे .. और यह अन्दाज़ा लगाते रहते थे कि,यह आवाज़ कितनी दूर से आई है ,किस ओर से आई है ..किसके घर को निशाना बनाया गया है .वगैरह वगैरह ..हम एक छोटे से कस्बे में रहा करते थे .लगभग सभी परिवार एक दूसरे  से अच्छी तरह परिचित हुआ करते थे ..सो किस घर को निशाना बनाया गया  है ..जानने कि बेचैनी  रहती थी ।
किसी तरह रात कट ही  जाती थी ,सुबह से लोगों में काना फ़ूसीशुरू हो जाती थी ,जिनके घर सुबह तक साफ़ -सुथरे दिख रहे थे ..वे गर्व के साथ यहां वहां चहल कदमी ,दूसरों के घरों मे ताका -झांकी करने लगते थे ..और जिनके घर कीचड से सराबोर होते थे ..उनमे से कुछ लोग तो सूरज निकलने से पहले ही अपने घर को धो चुके होते थे [ यह अलग बात है कि धुले -पुंछे घर रात क्या हुआ अच्छे से जाहिर कर देते थे  ]या देर सुबह तक अपने अपने घरों मे कैद रहते थे ..।

होली दहन का अगला दिन हमारे लिये खास मायने नहीं रहता था ..वजह ,इस दिन सभ्य घरों के लोग रंग नही खेलते थे ।सभी शरारती लडके ,अधेड..दहन के दूसरे दिन काफ़ी हुडदंग करते थे होली रंगों से कम कीचड से ज्यादा खेलते थे.. आपस मे एक दूसरे को उठाना, नालियां,ढूंढ-ढूंढ कर  उनमें पटकना आम बात थी .. हम लोग यह सब चोरी छुपे देखा करते थे ..दोज के दिन हम सब खूब होली खेला
करते थे ..बहुत मस्ती किया करते थे .इस दिन कोई हुडदंग नही होता था..भले ही होली हम एक दिन खेलते थे ,लेकिन होली -मिलन [एक दूसरे के घर होली के पकवान खाना ]एक महिने तक चलता था .बडा मजा आता था ..।

अब तो हमारे मायके मे भी इस तरह की होली नही खेली जाती..जिसका हमने जिक्र किया है ।हम शायद इस कीचड की हंडिया वाली होली के अंतिम पीढी के चश्मदीद गवाह है ।

हम अपने बचपन की होली के किस्से तो जब तब  बच्चों को सुना -सुना कर बोर कर देते है .उन्हें रट गये है ,लेकिन अब जब बच्चे हमसे होली पर जरा सी भी शरारत करते है [वो भी परमीशन लेकर ]तो हम उन्हें उपदेश देने लगते है ।मैने तो तय कर लिया है ,इस होली पर रोकूंगी -टोकूंगी नहीं ,आप भी ऐसा ही करिये ,और खुद भी होली के मजे लीजिये ।हैप्पी होली .....

Saturday, February 13, 2016

वजह हम तो नहीं ??



     क्या वजहें हो सकतीं है.आये दिन होनेवाली आत्महत्याओं की। खासतौर पर   तब,जब ये कदम स्कूलों में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा उठाया जाता है। आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां , किस तरह का मानसिक   दवाब या  तनाव इन बच्चों को होता है जो कुछ भी जाने समझे बगैर ऐसा भयानक कदम उठाते   है। आश्चर्य तो तब और भी अधिक होता है जब यह हरकत एक अच्छे खाते-पीते , सुविधासम्पन्न घर के बच्चे कर बैठते है। अनेकों बार  आत्महत्या करने की वजह सिर्फ और सिर्फ स्कूल कॉलेजों की परीक्षाओं में मनचाहे अंक न आना या पास न होना होती है। समझ  नहीं आता  की कोई बच्चा  मानसिक रूप से इतना कमजोर क्यों और कैसे हो जाता है क्यों उसमें जरा सी असफलता को स्वीकार करने की  हिम्मत  नहीं होती,क्यों वह अपनी कमियों या लापरवाहियों को दूर करने की कोशिश नहीं करता ,क्यों वह  दुगने जोश से फिर तैयार नहीं होता।  शायद यहां कमी बच्चों  से ज्यादा हम माता-पिता या अभिभावकों की है। शायद हमने ही दो -तीन साल की  उम्र से बच्चों के मन में यह बात अच्छे से बिठा  दी है की तुम्हें सिर्फ और सिर्फ पढ़ना है ,  अव्वल आना है। सात-आठ घंटे स्कूल में बिताने के बाद बच्चा ठीक  से सांस भी नहीं ले पाता और हम उसे किताबों के ढेर के सामने बिठा देते हैं ,वह भी डराते -धमकाते हुए 'तूने यह नहीं किया तो देखना ,अच्छी पिटाई होगी ,तेरा खेलना- कूदना ,टीवी देखना सब बंद।' कहते हुए। रही सही कसर हम दो-तीन घंटे की कोचिंग भेजकर पूरी कर लेते है।  पता नहीं क्यों हम माँ -बाप को चौबीसों घंटे पढ़ाई करता हुआ ,कॉपी-किताबों में लिखी हुई एक- लाइन को रटता हुआ बच्चा बहुत  अच्छा लगता है। जो बच्चा जितना ज्यादा किताबों में उलझता जाता  है  वह हमारा उतना ही प्यारा  होता जाता है। बच्चे का खेलना -कूदना हमें जरा भी नहीं सुहाता गुस्से में हम  उसे उपदेश पर उपदेशसुनाने लगते है। मै यह बिलकुल भी नहीं कहना चाह रही हूँ की बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में कम समय देना चाहिए या इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। मैं सिर्फ  कहना चाहती हूँ की बच्चों के मन में पढ़ाई को लेकर इतना डर इतना दबाव नही बनाना चाहिए की जरा सी असफलता उन्हें  बर्दाश्त न हो। एकपरीक्षा पास न होने पर  किसी के   सामने पड़ने की हिम्मत न कर सके। हमे बच्चे को हल्के और शांत दिमाग के साथ अपनी ओर  से पूरी मेहनत करने की कोशिश करने के लिए कहना चाहिए। उसके बाद यदि मनचाहा परिणाम नहीं मिलता है तो कमी कहाँ रह गई इस पर आपस में  सलाह-मशविरा करके पहले से बेहतर योजना बनाकर उस बच्चे के साथ-साथ खुद भी कोशिश करनी चाहिए। एक दोस्त बनकर।  साथ ही उसे तनावमुक्त  रखने के लिए उसे अपनी मनपसंद के काम,शौक भी पूरे करने देने चाहिए। हमें बस उसे अपना 'बेस्ट ' करने के लिए प्रेरित करना है उसे कक्षा में अव्वल लाने  के लिए नहीं।
              यहां हम अभिभावकों की भी मजबूरी है। अच्छे  अंक न आने पर कॉलेजों की तो छोड़िये छोटी कक्षाओं तक में बच्चों को    प्रवेश नहीं मिलता।   मनचाहे विषय नहीं मिलते। ऐसे में हम जाने-अनजाने बच्चों पर आवश्यकता से  अधिक दबाव बनाने लगते है अपनी सारी मजबूरी ,खीझ उनपर निकलने लगते है। धीरे-धीरे हम आपस में इतने दूर हो जाते है की बच्चे हम से छोटी से  छोटी बात छिपाने लगते है। हम से अपनी  परेशानी नहीं बांटते। उन्हें लगता है  अपनी कोई भी उलझन या किसी तरह के डर को हमसे कहने पर हम कुछ  भी जाने समझे बगैर उन्हें ही दोषी ठहराएंगे। ऐसे में किसी परीक्षा में असफल होना  तो बहुत बड़ी बात  है।  असफल होने पर माता-पिता और परिचितों का सामना करना  तो दूर वो खुद अपना सामना करने ,अपनी कमियों को समझने की हिम्मत नही रखते। 
              बात चाहे पढ़ाई-लिखाई की हो या किसी और विषय की  बचपन से ही हमें  बच्चों के  साथ  इस प्रकार का व्यवहार रखना  चाहिए जिसमें  बच्चे खुलकर अपनी परेशानियां  अपनी इच्छाएं हमारे आगे रख सकें , हम पर भरोसा  रख सकें।   यदि उन्हें भरोसा  है की हम उनके साथ है और हम भी उनपर विशवास करते है तो कोई वजह ऐसी पैदा ही नहीं होगी जो उन्हें भटका सके, आत्महत्या तो बहुत दूर की बात।    ..