Saturday, February 18, 2017

अपने हिस्से की खुशियां..



           कुछ  दिनों से देख रही हूँ , अपने आसपास  बहुत से लोगों को ,  ... बेहद फिक्रमंद हो गए है , अपने बढ़ते हुए बच्चों के भविष्य को लेकर। .. और हों भी क्यों न ! .. माँ -बाप यही तो चाहते है की उनके बच्चे अपनी ज़िन्दगी में सफल रहे , खुश रहें। .. आज जब मेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं ,. उनकी पढ़ाई-लिखाई और अन्य  विषयों को लेकर जो उन्हीं से सम्बंधित हैं मैं फिक्रमंद हूँ तो स्वाभाविक रूप से मेरा ध्यान उनलोगों की ओर  गया जो खुद बड़े असमंजस की स्थिति में हैं , अपने बच्चों  के भविष्य को  लेकर।

               आज हर माता -पिता की कोशिश होती है अपनी बेटी को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने की , आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की। .. शायद अब  कोई नहीं चाहता  की उसकी  बेटी शादी के बाद पूरी तरह से अपने पति पर आश्रित रहे।  . बल्कि हर कोई अब यही चाहता है की उसकी बेटी इतनी सबल हो , समर्थ हो की अपने साथ अपनी ससुराल वालों का भी भरपूर ख्याल रखे , सहयोग करे , हर तरह से , शारीरिक , मानसिक और आर्थिक रूप से।

        बस , एक बात जो मुझे कभी भी समझ में नही आई , कि  बेटी के सुखद  भविष्य के  लिए आज का इतना फिक्रमंद पिता क्युं  अपनी पत्नी की खुशियों का  ख्याल नहीं करता !(यह बात सब लोगों पर लागु नहीं होती ).. . यह कैसे संभव है की जिन खुशियों को अपनी बेटी की ज़िन्दगी में देखना चाहता है उनकी कमी उसे अपने घर में नज़र नहीं आती !. जो गुण वो बेटी के होने वाले पति में चाहता है , वो खुद में नहीं  लाता । .. शायद यह बात कोई समझना ही नहीं चाहता।  या जानबूझकर अनदेखा कर देता है।

             एक बार अपने आसपास के लोगों पर नज़र डालिये। . . बहुत से घरों की महिलाएं आपको ऐसी मिलेंगी जो  उच्च शिक्षित होने के साथ बुद्धिमान हैं ,  प्रतिभावान हैं , और जिन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी शादी-ब्याह के बाद सबकी ख़ुशी और ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दस-पंद्रह और बीस साल तक घर को दिए , अपनी  इच्छाएं अपने शौक अपनी ज़रूरत , सब कुछ भुलाकर ।  .. और इस बात की  शिकायत भी नही की।

     आज जब घर के बच्चे भी बड़े हो गए , सब अपने-अपने में व्यस्त हो गए , और तब दिन में कुछ खाली  समय पाकर, बचपन से खुद को लेकर  देखे गए छोटे-छोटे सपने ,...जैसे पूरा करने का ख्याल इन महिलाओं के मन में फिर आने लगा।  .. और पूरे जोश, उत्साह , तैयारी के साथ  ये अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लग गयीं।

              हालाँकि , ये सभी महिलाएं पैंतीस-चालीस साल की उम्र की ही हैं , पर इनका उत्साह , इनकी काम करने की लगन किसी युवा से कम नहीं।  यह डटकर बाहरी  दुनियां का मुक़ाबला कर सकतीं हैं। ... देख रही हूँ कि घर की तमाम जिम्मेदारियों को निभाते हुए , इस उम्र तक आते-आते बहुत कुछ करने की इच्छा और हिम्मत तो बहुत सी महिलाओं में होती है , पर घर का , घर वालों का सहयोग तो दूर समर्थन तक आसानी से नहीं मिलता।  गिने-चुने लोग हैं जो सालों  बाद घर से निकल कर बाहरी दुनियां में कुछ करने की आज़ादी पाते  हैं।  ज्यादातर घरों में तो मज़ाक ही बनाया जाता है ,.  बाहरी तो छोड़िये , सबसे पहले घरवाले ही व्यंग्य कसते नज़र आते हैं . पूछ बैठते हैं -'' तुम करोगी ! अब !.. इस उम्र में !.. दिमाग फिर गया है क्या ? ''..... कोई कमी नहीं रखते हतोत्साहित करने में।

               कोई स्त्री हो या पुरुष , बिना घरवालों के सहयोग , समर्थन के आगे नहीं बढ़ सकता।  .. हां ऐसे भी  लोग होते हैं जो कुछ करने के लिए सबसे लड़कर आगे बढ़ते हैं। और सफलताएं भी पाते हैं। .. पर यह सबके वश की बात नहीं।  खासतौर से तब जब दस-पंद्रह  साल किसी और की इच्छा , ख़ुशी के हिसाब से जीने  की आदत हो गई हो ।

        बहुत सी ऐसी महिलाओं  से मिलना होता है जो बच्चों के बड़े हो जाने के बाद , घर की तमाम जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने खाली  समय में   कुछ करना चाहतीं है , आत्मसंतुष्टि  के लिए , आत्मनिर्भर होने के लिए और कहीं -कहीं तो घर की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए भी। ... पर पता नहीं क्युं , इनमें से ज्यादातर महिलाओं को अपने बच्चों , रिश्तेदारों , दोस्तों सबका  भरपूर समर्थन  मिलता है लेकिन अपने पति का नहीं।  .. और घरों में यह एक बड़े झगडे का कारण  भी बनता है।  जो दिन-रात  चलता है।  .. ऐसे में बड़े होते बच्चों को तनावरहित , शांत माहौल देने की  कोशिश में ये महिलाएं एक बार फिर अपनी इच्छाओं को मारते  हुए , घर की छोटी-छोटी ज़रूरतों को पति पर निर्भर रहते हुए , झगडते हुए , फिर घर में ही सिमट जातीं है। ..

  हाँ , कुछ ऐसी भी हैं जिन्हें घरवालों का पूरा-पूरा सहयोग मिलता है , सब हर वक़्त  उनके साथ होते हैं ,  मदद को तैयार होते है।  .. जिन्हें यह सब मिलता है वे तनावमुक्त होकर बेहतर काम करतीं है।

        हम कह सकते हैं की जब ये दुनियां भर का सामना करने की हिम्मत रखतीं है तो क्युं सिर्फ एक आदमी की इच्छा-अनिच्छा  का इतना खयाल करतीं है !.. और वह  भी उसकी जो उनकी भावनाओं का ज़रा भी ख्याल नहीं रखता !.... पर ऐसा होता है। ... सालों  हम जिसके हिसाब से चलते हैं न , चाहे वो कोई भी हो , उसका विरोध करने की हिम्मत , साहस हममें बड़ी मुश्किल से आता है। .चाहे . हम कितने भी सही क्यों न हों। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हमारा कोई अपना , कोई दोस्त ही हमें हिम्मत बंधा  सकता है। .. बस थोड़ी सी हिम्मत ही तो चाहिए , ...सही को सही कहने की , अपनी बात कहने की।

          सच तो ये है की सबकी देखभाल और सहयोग करने के लिए हमें अपनी  इच्छाओं , अपने आप को नकारने की ज़रूरत नहीं।  .. सबकुछ एक साथ संभव है , घर, घरवालों की देखभाल और अपनी पहचान। बल्कि जब हम अपने आप को भरपूर जीते है तब औरों को खुशियां ज्यादा बेहतर तरीके से दे सकते हैं। .. ऐसा मेरा सोचना है। ..

       कोशिश कीजिये , सबको अपने हिस्से की खुशियां मिलें , . हम किसी की खुशियों में , सफलताओं  में रोड़ा न बने।  .और क्युं  बनें ? .... हम अपने बच्चों की ज़िन्दगी में भी तो यही सब देखना चाहते हैं न !

     
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